गुरु की आवश्यकता
जिस तरह सूर्य की शोभा धूप से, चन्द्रमा की शोभा चांदनी से, वृक्ष की शोभा फल-फूलों से, राजा की शोभा न्याय से, पिता की शोभा सुपुत्र से, माता की शोभा शूर एवं दानी पुत्र से है उसी तरह से गुरु की शोभा सद्शिषय से होती है। "जैसे बहते जल से नदी का अस्तित्व है, उसी प्रकार शिष्य से ही गुरु का अस्तित्व है। गुरू सूर्य स्वरूप है तो शिष्य उसकी धुप है, गुरु चन्दन के सदृश है तो शिष्य कृति रूपी सुगंध को फैलाने वाले वायु के समान है। प्राचीन काल से आधुनिक काल तक द्वापर, त्रेता, सतयुग या कलयुग रहा हो, हर युग मे गुरु का एक अलग महत्व
रहा है।
" आँखे हो तो देख कलब के पर्दे मे अल्लाह
भवसागर पार उतारने को गुरु है, मल्लाह।"
सही मे एक सत्य मार्ग पर चलने के लिए गुरु का होना आवश्यक है।
रहा है।
" आँखे हो तो देख कलब के पर्दे मे अल्लाह
भवसागर पार उतारने को गुरु है, मल्लाह।"
सही मे एक सत्य मार्ग पर चलने के लिए गुरु का होना आवश्यक है।

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